एक न्यायी प्रजातंत्र के लिए सामान न्याय पध्दती आवश्यक के लेकिन ये देश में नातो न्यायतंत्र हे न तो प्रजातंत्र हे न्यायतंत्र यहाँ जिसके पास मनीपावर हे या फिर मशल पावर हे वो राजा हे बाकि सब भिखारी वो लोग हजारो करोडो के गोटाले करे तेलगी की तरह राजू की तरह केतन पारेख की तरह हर्षद महेता की तरह मुलायम की तरह लालू की तरह या फिर हजारो निर्दोष लोगो को मार दे टाइटलर की तरह मोदी की तरह कोई नहीं रोकेगा और एक निर्दोष आदमी जो इंडियन पीनल कोड को नहीं जनता हे उनके ऊपर इतनी कलम लगते हे के कलम के भार से ही दब के मर जाता हे. जिन के पास खाना खाने के लिए नहीं हे उनके इ आरोपनमा बनता हे के उनके पतों पैसे में ही उनकी जिदगी निकल जाती हे. और ये पूजीवादी नेता, उद्योगपति हजरों किसानो की जमीन लेलेगे बाद में बड़ी फेकटरी खोल के रख देते हे लेकिन कभी उष ऐरिया में कोई काम किया हे किशनो के लिए कोई केनाल बनायीं हे कभी ? गरीबो और वंचितों के बच्चे के लिए कोई स्कूल बनया हे ? जमीन के बदले में कभी शेर दिया हे इन लोगो को? ये लोग तो हेलिकोप्टर में उड़ते हे लेकिन गावो में कभी अच्छी बसों का क्यों इंतजाम नहीं करते हे ? ऐरपोर्ट बडिया बनाते हे लेकिन कभी बस स्टैंड की और देखा हे इन लोगो ने ? क्यों के इश देश के भ्रष्ट लोगो ने मनी के जोर से न्यायतंत्र की डोरी ने अपने हाथ में रखी हे और ऐसी न्याय पध्दती बनायीं हे जो इनके फायदे की हो आजभी उदिशा जर्खंड छतीसगढ़ की खदानों आशम के बागन बड़ी बड़ी इन्डशट्रिश उन लोगो के कब्जे में हे कोई आम आदमी को आगे नहीं आने देते हे ये लोग सर्कार की बड़ी नोकरी भी इं लोग के बच्छो के पास आजाती हे लेकी गरीबो के बच्छो को कभी देखा हे अफसर बनते हुए एकड़ को बनके मीडया के सामने ऐसे पेश करते हे जेसे के सभी गरीब को बड़े बंगले बना दिए हो आज आम लोग जुटे फेक रहे हे तो उनकी नींदा करते हे लेकिन ये लोगो लेकिन कभी भ्रष्ट राजकारणी की की निंदा की हे इन लोगो ने ?
सोचो महान भारत के महान लोको ये देश को बेचने वाले विभीषण और अमीचंद हे
अपनी मातृभूमि के दलाल हे इन दलालों को हटाया नहीं गया तो ये गिधदो की तरह हमारी देश और प्रजा को खा जायेगे और बाद में उनके रहने के लिए चले जाये गे अंग्रेजो के पास अमेरिकनों के पास यूरोपियन के पास क्यों के उन के बच्चे को तो पढाई के लिए भी वहा क्यों भेज देते हे और बाते तो मातृभाषा और मातृभूमि की करते हे तब कहा जाती हे मातृभाषा और मातृभूमि
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment